Ramesh Mendiratta
Abstract Comedy
जादू की बोतल से निकला एक पेग,
जीवन की गाथा में छुपा रहा रहस्य।
जादू की बूंदों में बसा था अद्भुत सफर,
जिसमें खो जाते थे सपनों के तारे।
न मारो मुझे म...
नेता ठेकेदार ...
निर्वस्त्र इच...
बगुला छाप स्थ...
रीढ़, पुल आदि...
मैं खुद चला ज...
य़ह सपने non ...
विज्ञापनों की...
फासले.. एक वि...
अधूरे ख्वाब
समुद्र में मिठास की तरह हैं उनके बारे में, मैं क्या लिखूं। समुद्र में मिठास की तरह हैं उनके बारे में, मैं क्या लिखूं।
ख्वाईशों की बरसात लिखूँ... या जरूरत की कुछ बूँदे लिखूँ ... आख़िर क्या लिखूँ।! ख्वाईशों की बरसात लिखूँ... या जरूरत की कुछ बूँदे लिखूँ ... आख़िर क्या ...
जताती नहीं किसी को, पर नजरें हैं कि मेरी मानती नहीं। जताती नहीं किसी को, पर नजरें हैं कि मेरी मानती नहीं।
अधीनता में लिपटे अतीत से स्वतंत्र होने तक की प्रकिया एक कविता है। अधीनता में लिपटे अतीत से स्वतंत्र होने तक की प्रकिया एक कविता है।
पूर्णिमा वाले चन्द्रमा की तरफ से नजरें नहीं हटते। पूर्णिमा वाले चन्द्रमा की तरफ से नजरें नहीं हटते।
लफ्जों की आग में कितने रिश्ते झुलस गए, जो प्रेम से रहे वो गिरने से पहले सम्भल गए। लफ्जों की आग में कितने रिश्ते झुलस गए, जो प्रेम से रहे वो गिरने से प...
तुम भुला ना पाओगे , ये जानते है हम जिन्दगी साथ में जीने की खाये थे कसम तुम भुला ना पाओगे , ये जानते है हम जिन्दगी साथ में जीने की खाये थे कसम
उसे रोको वो ग़जल कर रहा है खबर नहीं उसे वो कत्ल कर रहा है। उसे रोको वो ग़जल कर रहा है खबर नहीं उसे वो कत्ल कर रहा है।
चाहते हो न! ज़िन्दगी न हो मुझसे जुदा। तो खुद को मेरा ,मुकाम देना।। चाहते हो न! ज़िन्दगी न हो मुझसे जुदा। तो खुद को मेरा ,मुकाम देना।।
बोलतीं एक दूसरे से बुनती एक ताल कहानी की लय में। बोलतीं एक दूसरे से बुनती एक ताल कहानी की लय में।
आजकल, तेरे दरबार में कम, कहीं और व्यस्त लाग रहे हो। आजकल, तेरे दरबार में कम, कहीं और व्यस्त लाग रहे हो।
ना जाने तू कब क्या होगा आज है हम, कल हों ना हों, ना जाने तू कब क्या होगा आज है हम, कल हों ना हों,
माँ ने कहा पानी में झाँककर। अपने चेहरे पर मत रीझना। माँ ने कहा पानी में झाँककर। अपने चेहरे पर मत रीझना।
तुम्हें एक नजर देख लेते तो हर जख्म भर जाते। तुम्हें एक नजर देख लेते तो हर जख्म भर जाते।
कोई तो दहशत में सिसकती आवाज को सुनो। कोई तो दहशत में सिसकती आवाज को सुनो।
तो आखिर इस जमाने के साथ चलूं कैसे? तो आखिर इस जमाने के साथ चलूं कैसे?
हमेशा शायद ये एहसास काग़ज़ पर उतारने के लिए काफी नहीं ! हमेशा शायद ये एहसास काग़ज़ पर उतारने के लिए काफी नहीं !
देश की चोटी पर ये, बड़े शान से लहराता है। देश की चोटी पर ये, बड़े शान से लहराता है।
अंतर्मन को 'देव' शरण स्थली बना ले खुशियों का त्योहार है जीवन इसे मना ले। अंतर्मन को 'देव' शरण स्थली बना ले खुशियों का त्योहार है जीवन इसे मना ले।
क्योंकि तू अनजान है की कितना बदल गई हूं मैं। क्योंकि तू अनजान है की कितना बदल गई हूं मैं।