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Uma Shankar Shukla

Abstract


4.8  

Uma Shankar Shukla

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जंगल-जंगल हुआ शहर

जंगल-जंगल हुआ शहर

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धुआँ - धुआँ अवसन्न दिशाऐं, काजल-काजल हुआ शहर।

सिरहाने  इतिहास  दबाकर, ओझल - ओझल हुआ शहर।

थका - थका  सूरज  मुंडेर  पर,  गुमसुम - गुमसुम किरण लिए,  

ऑगन - ऑगन  धूप  सिसकती, बादल-बादल हुआ शहर।

भूख - प्यास  के  कम्बल   में ,  सोए  बर्फीली रात  लिए,  

जागे  तो  दिन  लगा  अपरिचित,  दंगल - दंगल हुआ शहर।

दहशत की  रेतों  पर ,अपनी  परछाईं  से  डरा - डरा,  

सन्नाटे  की  चादर  ओढे,  जंगल - जंगल  हुआ शहर

जबसे  उपवन  के  माली  को, डसा  फूल  ने चुपके से

हिंसा  के  बबूल  उग  आए,  घायल - घायल हुआ शहर।

जातिवाद    की   बन्दूकों    में,   नफरत    की बारूद  भरे,

सत्तालोलुप   गिद्ध   नाचते,   चम्बल  - चम्बल हुआ शहर।

शायद  मन  के  बाज आ  गए, उड़े  कबूतर    नीड़ों से

मानवता  की   लाश  नोचता,  पागल - पागल हुआ  शहर।

धू - धू कर  जलती  बस्ती  के, अधर  नही चेहरे बोले,

मौसम की पथराई ऑखें, निर्जल-निर्जल हुआ शहर।

घूस  - दलाली - लूट  - अपहरण  के  पगलाए पशु देखो,

चरे  जा  रहे  पावन  संस्कृति, निर्बल - निर्बल हुआ  शहर।


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