STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

ये मेरी प्रिय आजादी

ये मेरी प्रिय आजादी

1 min
164

ऐ मेरी प्रिय आजादी

तुम मेरे पास थी

और मैं तुम्हें ढूंढ रहा था

ढूंढा तुम्हें

समाज मेम


विचार में

निजाम में

और मिली तुम

मेरे पास


और जैसी मेरे पास हो

वैसी तो कहीं नहीं थी।

तुम्हें पाकर ऐसा लग रहा है

बेगाना सा हो गया हूँ मैं

और आज तुम्हारे इस उत्सव के

महापर्व 


अमृत महोत्सव पर

लोग ढूंढ रहे हैं तुम्हें

मेरी तरह।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract