।। यादों के परिंदे।।
।। यादों के परिंदे।।
मन के घोंसले से उड़ चले,
हैं आज यादों के परिंदे,
फड़फड़ाके पंख ख्वाबों के,
खोजते छाँव अपनेपन की,
स्मृति पटल पर करते विराम,
जीवन को बस ये देते आयाम,
यादों के परिंदे उड़ चले।।
रंग इनके भी श्याम, स्वेत हैं,
और कुछ चितकबरे भी,
जैसे मन को भाते या डराते,
और कुछ जिन को मन ही न जाने,
डाल कर सवालों का जाल,
बस मुझे छोड़ कर अब मेरे हाल,
यादों के परिंदे उड़ चले।।
ये न हों तो हूँ तन्हा मैं बस,
गर हौं तो भी है सकून कहाँ,
जिसे भूलना चाहूं मैं रात दिन,
वो स्मृति पटल पर बना नीड़ अड़ा,
और जिसको करना चाहूँ बस में,
वो पंख लगा जा दूर उड़ा,
आज फिर गम को लगाने को गले
यादों के परिंदे उड़ चले।।
