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नन्द कुमार शुक्ल

Abstract

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नन्द कुमार शुक्ल

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यादें

यादें

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249


अब न दिन वो सुहाने न राते हसीन,

उलझनो मे उलझ रह गई जिन्दगी ।

एक था दौर जब एक मुस्कान को, 

लाख कोशिश थे करते हमारे सभी ।

आज हंसती हुई जिदंगी देखकर, 

गम के सागर से है वो निकलते नहीं ।

अपना हिस्सा कभी थे जो देते हमे, 

आज हक मारते उनको लज्जा नहीं ।

मुझको कांधे बिठाकर कर पकड जो चले,

 दूर वो हो रहे आज हमसे है क्यो ।

प्रश्न है ये कठिन इस पे सोचा नहीं ,

दोष अपना भी औरो के ऊपर मढा ।

काटकर त्याग अर्पण चरण प्रेम के, 

कह रहे है कि अब प्यार चलता नहीं ।

प्रेम और प्रेमियो के ह्रदय की कसक, 

प्रेम सच्चा किया जिसने समझे वही।

स्वार्थ की सुन्दरीके जो आगोश मे ,

प्रेम क्या है कभी कभी जान सकते नहीं ।


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