वसीयतनामा
वसीयतनामा
दर्दनाक वह दृश्य
वह रुदन, वहआर्तनाद ,
असुरक्षा,अस्थिरता की तस्वीर
आंसू जो न थमते थे
सिसकियां दिल को
थीं दहलाती
इन सबके बीच
बैठी निस्पृह, बेजान
एक मूर्ति की तरह वह
जिसके पति का था
हुआ आज निधन,
बस आंख झपकते ही-
अचानक गिरी बिजली
आसमान से-
देखते ही देखते बदला
नक्शा ज़िंदगी का
पल भर में ढह गया किला
संजोये सपनों का
कौन जानता था निगल लेगी
मृत्यु इस तरह एक स्वस्थ,
सक्षम,सबल,समर्थ इन्सान को
कुचल देगी ज़िंदगी को यूं
अपने निर्दयी पैरों तले
न छुएगी उसे किसी की हाय
आ जा रहे थे शुभचिंतक
सान्त्वना प्रकट करने-
नाज़ुक ऐसे पल ,संवेदना
और स्नेह भरे
शब्द जैसे कर बैठें
हड़ताल
क्या कहें ऐसा ,जो दे पाए
दुखी दिल को दिलासा-
फिर भी कभी कभी
चुप्पी ही कह जाती है
मन की बात
शब्दों से बेहतर
बैठी जब मैं उसके पास
पकड़ा उसका हाथ
और गले लगाया -
इससे पहले कि मैं कुछ बोलूं,
कुछ कहने को आतुर
मैंने उसे पाया
रुंधी आवाज़ में बोली
"जीवन अगर मिले दोबारा
चाहूंगी यही ,मिले बार बार
जीवन साथी यही
हों हम साथ हमेशा
सुख दुख के बन साथी
कभी सुनी न मैंने अप्रिय बात
न झिड़की कभी
ज़रूरतें सदा हुईं पूरी सभी
बच्चों को मिला
पिता का प्यार दुलार ,
उनकी छत्र छाया
मगर कहनी है इक बात मुझे
जो खाये जा रही है मुझको
कह न सकूंगी शायद
और किसी से कभी
मन के ऊपर है जो बोझ
करना ही है हल्का
आज,जब खटकनी चाहिए मुझे कमी
अपनी सबसे अनमोल निधि की-
मेरे मन में है एक नाराज़गी
एक असंतोष का अहसास,एक निराशा
क्यों धकेल दिया मुझे मंझधार में
क्यों किया मेरे साथ यह अन्याय
क्यों समझा नहीं मुझे भरोसे लायक
क्यों समझा मुझे इतनी गई गुज़री
क्यों समझा मुझे नालायक़ से नालायक़
क्यों आर्थिक स्थिति का लेखा-जोखा
दो एक बार पूछने पर भी
रखा छुपा कर मुझसे,नहीं किया साझा मुझ से?
आज मुझे कुछ मालूम नहीं, क्या है करना,
कहां से करूं शुरुआत नई?
किस मुंह से दूं बेटे बेटियों को जवाब ?
कितना असहनीय होगा वह दृश्य
जिसमें आयेंगे उनके मनमुटाव नज़र
हूंगी कटघरे में जैसे खड़ी, ढूंढती उनके जवाब
किस मुंह से दूं बेटे बेटियों को जवाब ?
कि समझा नहीं उनके पिता ने
मुझे इस लायक कि साझा करें मुझसे
इतनी महत्वपूर्ण बात
ज़िंदगी भर का साथ,क्या था बस एक प्रण
रहा नहीं जिसका कोई मायना ?
ज़िन्दगी तो मेरी बस अब अकेली है-
कैसा साथ निभाया?
कुछ तो आसान किया होता मेरे लिए
हर जगह एक ही सवाल
है क्या कोई वसीयत,कोई ऐसा दस्तावेज़
कोई काग़ज़ात,कोई चिट्ठी पत्री
जिसमें हो उल्लेख संपत्ति का,बटवारे का,
किसी के नामांकन का?
सवाल पर सवाल- जवाब कहां है मेरे पास ?
कुछ भी तो मालूम नहीं मुझे
रखा मुझे अबोध अनजान
समझी इसमें अपनी शान
आज कुछ भी मालूम नहीं
कहां से करूं शुरू
नया लेखा -जोखा,नई ज़िम्मेदारी
खड़ी हूं पशोपेश में
न पीछे जा सकूं,न आगे
न डूब सकूं न उभर सकूं
यही है मंझधार
बस यही है मंझधार
