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Kishore Kumar

Romance

3  

Kishore Kumar

Romance

वो वासंती मौसम

वो वासंती मौसम

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उनकी खुशबू 

अब भी ताजी है 

वर्षों से सांसों में समाई है 

जब भी चलती है

उनकी महक आने लगती है।


अब भी मंद-मुस्काती 

अधर उनकी दिखती है 

गुलिस्तां भरे चमन में 

जब कई कलियाँ आपस में 

लिपटी रहती हैं।


गेसूंओ में उलझी उंगली 

वसंत आने से महसूस होती है,

कली- लता से उलझती है 

आहिस्ता से कहती है 

मैं वहीं हूँ जिसे छेड़ा करते थे।


वो वासंती मौसम 

भी अजीब था,

पहली और आखिरी मिलन का

मिलानेवाला और

आखिरी राजदार था।


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