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Preeti Sharma "ASEEM"

Abstract

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Preeti Sharma "ASEEM"

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वो मेरी सोच -सा कहां था

वो मेरी सोच -सा कहां था

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वो मेरी सोच -सा कहाँ था.......!


मैं तो उसे ,

हर चीज में ,

महसूस ही कर रहा हूँ।

वो कुदरत बनके,

मेरी प्ररेणा के संग खड़ा है।


वो देखता है, मुझे

मैं कहाँ देख रहा हूँ।

मैं उसकी सोच से,

बहुत परे हूँ।


मेरी तमाम कोशिशों को,

वो देख रहा है।

वो जानता है।

मैं कितनी बेचैनी से,

किसे ढूंढ रहा हूँ।


वो मेरी सोच जैसा कहाँ था....


जिंदगी ढूंढती है,

जिन किनारों को।

उन किनारों के,

वो दूर के नजारों से।


मैं तुम्हें ढूंढता रहा था।

साल दर साल बदलती,

उन बहारों में,


तुम दिला गये,

विश्वास मेरे ,

मन के अंधियारों को।


मैं वो सोच.....

कहां से लाता ।

तुम्हें सोच पाने की।


जो सोचता हूँ,

तुम हो कैसे..

हूबहू मेरी ही,

सोच के जैसे।


 तुम्हें देखूँगा।

इन आँखों की ,

हसरतें भी है ,

दिवानी-सी।


तुम अपनी सोच में,

उतार लेना मुझको।

शायद फिर ही मिलें।

सोच तेरी, सोच मेरी।।


  


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