वो खेतों में काम करने वाली
वो खेतों में काम करने वाली
उसने सूरज को
निकलते देखा है
उसने आसमान का रंग
बदलते देखा है
नर्म हवा को छूकर
भोर के चांद को
विदा किया है
पंछी,हवा,पानी,
खुशबू को
जी भर के जिया है
अपने जीव को खुद से
रूह जैसा सिया है
वो बादलों को लपेटकर
बूँदों को झेलती है
वो बाँधकर पल्लू से
मस्त हवा को खेलती है
स्वेद कणों का गहना
पहनती है वो
धूप को ओढ़कर
दर्द खर्च कर देती है सब
कुछ नहीं रखती जोड़कर
बनाकर मुसीबतों का
सिराहना
वो खो जाती है
सपने उसकी राह देखते हैं
और
वो सो जाती है
वो खेतों में काम करने वाली
इसे अपना नसीब कहती है
आराम से भरी,
ग़म से डरी दुनिया
उसे ग़रीब कहती है .......।
