STORYMIRROR

Anand Mishra

Abstract

4  

Anand Mishra

Abstract

वजूद

वजूद

1 min
347

क्या ग़ज़ब, मेरे क़ाबू से बाहर ग़र है, 

मेरा दिल भी मेरा नहीं, तेरा घर है..


सोच कर क्या करूं,पाया किसे और खोया क्या,

सब मेरा है जो तेरे दर पे ये मेरा सर है..


दुनिया को यूं रोशनी से मत भिगा आफ़ताब, 

हमें अधेरों की आदत है, रोशनी से डर है..


ज़रा ठहर ज़िन्दगी, कदम मिला तो लूं, 

तेरी रफ़्तार मेरे पांवों की कूवत पे सर है..


वो गया तो यूं गया, कि जैसे कभी था ही नहीं, 

मेरे शानों पे फ़क़त,अब मेरा ही सर है... 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract