विश्व कविता दिवस पर विशेष
विश्व कविता दिवस पर विशेष
हम स्त्रियां बहुत थोड़े में ख़ुश हो लेती है
कोई पतला भर कह दे,दिन बन जाता है
साड़ी अच्छी लग रही, चेहरा खिल जाता
सब्जी में मजा आ गया, मूड बन जाता
फोटो अच्छी आ जाये चेहरा खिल जायेगा
कामवाली आ जाए,सब काम हो जायेगा
भटूरे फूल जाए, तो हम भी फूल जाते
डोसा चिपक जाए,तो हम उदास हो जाते
मां का फोन आया तो एनर्जी मिल जाती
सास तारीफ़ कर दे तो स्वर्ग हो आती
बच्चें मेडल्स लाए तो फूले नहीं समाते
पति की सैलरी बढ़ी भाव हमारे बढ़ जाते
बस इनको कोई गोलगप्पे से पटा ले
गर्म जलेबी खिला इन्हें अपना बना ले
बस कोई दो मिनिट इनकी भी सुन ले
इनके किए को कोई कमतर ना बोले
हम नारिया पतंग की माफिक होती है
आसमां पे नज़र पर डोर से बंधी होती है
अपनी उड़ान को ये हर पल देखती है
पर सांझ ढले मांझे की होकर जीती है
हम बड़ी, बड़ी चाहतें नहीं रखती
बड़ी, बड़ी उलझनों में नही फंसती
बस एक धूप का टुकड़ा गर हमें मिल जाए
हमारी बगियां का हर फूल फ़िर खिल जाए।
