वीर (नज़्म)
वीर (नज़्म)
चल पड़ा है कलम वीर की बन जुबाँ।
लिख रहा है अधूरी कईं दास्ताँ।
वीरों की इस धरा पर नहीं वीर कम।
जोश भी है उन्हें देख और आँख नम।
खोज डाले है इतिहास कितने छुपे।
जो किताबों में शायद नहीं थे छपे।
जान दुश्मन की कोई तो लेता रहा
कोई बलिदान खुद का ही देता रहा
सामने जो भी आया वो ख़ल ढेर था।
जब तिरंगा लिए हाथ में शेर था।
हर शिखर उस हिमालय का खुश तब हुआ।
हिंद के भाल पर जब तिरंगा लगा।
हिन्द के वीर विकराल होते कहीं।
काल भी सामना करने पाता नहीं।
मौत को वो गले गर लगाते नहीं।
जश्न आज़ादी का हम मनाते नहीं।
