वहमी
वहमी
कहते हैंं,
औरतें होती हैंं वहमी ।
हां बिल्कुल, औरतें होती हैंं वहमी ।
पर,
अपने लिए नहीं ,अपनों के लिए …
खुद की बीमारी को हरदम पीछे डालती हैं ,
डॉक्टर तो वहम में डाल देगा ,
कहकर खुद के इलाज को टालती हैं ॥
पर जब बच्चा हो बुखार में ,
बेशक करती हैं मालिश , मरहम और दवाई ।
और साथ में करती हैं - नून राई।
कभी नजर की बाती ,
कभी नजर का टीका ।
कभी मन्नत का धागा ।
मां हैं ना ,
कहीं कोई कमी तो रह जाए ना ।
जिस भगवान के सामने हाथ जोड़ती हैं ,
और पल में रो रो कर दे देती हैं उलाहना ॥
नहीं देख सकती वो बच्चे को भूखा ,
एक वक्त ना खाएं खाना तो ,
10 बार माथा छूकर देखती हैं ,
हर 1 मिनट बाद टोकती हैं ।
खाने में 50 ऑप्शन बताती हैं ,
मां हैं ना ,
बच्चों को उनसे खुद से बेहतर जानती हैं ।
और हर आखिरी जतन कर डालती हैं ।
मां हैं ना ,
और मां कहां हार मानती हैं ?
पर बच्चों को कहां समझ आता हैं,
उन्हें समझ आता हैं कि ..
औरतें होती हैं वहमी ।
