वह सब कुछ है
वह सब कुछ है
जो मैं बता रही हूं वह पूर्ण सत्य है
ना काल्पनिक है ना कोई कहानी है
हर एक किरदार निभाया है उसने
जीवन में जोखिम उठाया है उसने।
जवाब नहीं है उसका क्या लिख दूं
ये एक छोटी कविता में क्या कह दूं
इकलौती थी मां बाप की वो अपने
बेटा बन कर भी दिखाया पर उसने।
पढ़ने में थी बहुुत ही वो आगेेेे व चंचल
हर कक्षा में रोज आती थी वो अव्वल
सारा दिन रात पढ़ने मेंं ही था गुुजरता
चाहेेेे कोई खेलेे या चाहेे कुछ और करता।
मां हमेशा बीमार रहती पिता बस कमाता
रोटी तक सीमित थी पिता की कमाई
इस वजह सेे खुद ही करती थी पढ़़ा़ई
रोज परिवार पैसे के लिए मालाएंं बनाता।
लंबी बीमारी के चलते पिता थे गुजर गए
मां बेटी के अरमान थे अब सारे उजड़ गए
जैसेे तैसे खुद को संभाल बेटी ने जिम्मा लिया
ना चाहकर भी प्राइवेट नौकरी में हिस्सा लिया।
मां के लिए रोज दवाइयों का खर्चे का पर्चा था
जालिम जमाने के ताने और आंखों में आसूं
स्कूल में पढ़़ाती वो खुद भी पढ़़ती थी अपना
सोचती ना जाने सर पे किस जनम का कर्जा था।
बनी थी एक समझदार बेटा होकर भी एक बेटी
खुद ही सब काम करती अस्पताल की फीस देती
घर संभालती तो किसी की पसंदीदा शिक्षिका थी
घर पर बाहर और स्कूल तीन स्थानों में पढ़ाती थी।
