उथले से तुम,सागर सी गहरी मैं
उथले से तुम,सागर सी गहरी मैं
मैं जिस वक्त तुम्हारे प्रेम में रहा करती थी,
उस वक़्त मैं भूल जाया करती थी कि,
वक्त है क्या... और ये वक़्त सदा नहीं रहेगा!
बस गए थे तुम मेरे ह्रदय में बेहद गहरे,
एक मनमीत के सदृश प्रेमसिक्त होकर :
फिर प्रेमी से आगे हो गए तुम सबसे बढ़कर!
और फिर मुझे याद रहा किया बस यही कि,
प्रेममय हूँ मैं... मेरी तरह प्रेममय हो तुम भी :
अलग नहीं एक दूसरे से हम दोनों ज़रा भी!
याद रहा वह पेड़ जिसके नीचे कभी हम मिले,
चंदा की अमावस, पूनम की रात में मन मिले :
सूरज की उष्ण तपिश में हमारे कभी तन जले!
मेरे प्रणय सूत्र की गहराई नहीं नाप सके तुम,
सागर तल से क्षितिज के इस पार से उस पार :
पर ना डूबे गहराई में और चले गए उथले ही रहे तुम...!
हाँ... बेहद उथले ही रहे तुम।

