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GOPAL RAM DANSENA

Abstract


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GOPAL RAM DANSENA

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उपेक्षित

उपेक्षित

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मैं पसरा हूँ नभ में तारों सा ।

या धरा पर तृण प्रसारों सा ।

सोचता अक्सर कहाँ चूक है I

क्यों मुझे पहचान की भूख है I


चलो बेहतर मेरा वजूद तो है ।

मना कभी जश्न खूब तो है ।

पल्लवित हो जग ये प्रमुख है ।

सब मंगल हो यही सुख है I


महफिल में आ बैठा हूं I

महज एक रज जैसा हूँ I

तिलक उनके केशर चन्दन दीप्त मुख है I

तृष्णा उनसे ही उनमें जो मेरे सम्मुख है I


बाँध समा जो तेरे पल्लू में आए ।

ले जाएगा क्या समय के साये ।

अंतर्मन में पुनर्जन्म सम्मुख है I

क्या जीवन मरण यहीं दुःख है ।


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