उम्मीद
उम्मीद
हम मजबूर है साहब
कलेजे में पथर रख घर से निकले थे हम
बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद में
आज, एक बार फ़िर
आँखे नम किए, बैग उठाए
कंधे पे बच्चे को बिठाये
भूखेपेट, नंगे पैर
यूँ ही मजबूर क़दम बढ़ा दिया
अपने घर की राह में
अब तो, मत रोको न टोको हमें
ऐ चिलचिलातीं धूप,
ऐ आँधी- तूफ़ान
ऐ काली अंधेरी रात
बस, इस बार घर पहुँचा दो
घर पर बूढ़ी माँ वाट जोह रही है
बस एक बार अपने गले
लगाने की उम्मीद में
ये क़दम थकेंगे पर रुकेंगे नहीं
हर कष्ट, तृष्णा की तिलांजली देता चला
बस अपनों से मिलने की उम्मीद में
बस, इस बार घर पहुँचा दो
अपने मिट्टी की ख़ुशबू महसूस करा दो
फ़िर जी उठेंगे नयी ज़िंदगी की उम्मीद में।
