उलझन, ज़िंदगी नहीं
उलझन, ज़िंदगी नहीं
मैंने अपनी ज़िंदगी में,
किसी के लिए कुछ पॉज़िटिव नहीं किया,
इसलिए नहीं किया कि, किया नहीं,
इसलिए कि दुनिया ने कहा—
"तूने किया ही क्या है?"
सच है,
बहुत पॉज़िटिव करने पर,
रिस्पॉन्स नहीं मिलता।
ज़रा सा नेगेटिव कर के देखो,
तुरंत रिएक्शन मिलता है।
अच्छाई तो ऑक्सीजन जैसी होती है,
हर सांस के साथ अंदर जाती,
और बिना महसूस हुए, कहीं घुल जाती।
पर बुराई?
किसी हेल्दी शरीर के इम्यून रेस्पॉन्स की तरह,
दिमाग से तलवों तक सेकंड्स में पहुंच जाती है।
भाव-भंगिमाएं बदल जाती हैं।
फिर भी मैं सोचता हूं,
ग्रैविटी की तरह अच्छा करने की आदत न छोड़ूंगा,
दुनिया के फीडबैक से क्यों रुकूं?
मैं वो काम करूंगा,
जो मेरे कॉग्निटिव सिस्टम को सही लगेगा,
बिना रेस्पॉन्स के भी इनोवेटिव बन मुस्कुराऊंगा।
