उद्वेग और मैं
उद्वेग और मैं
और एक सुबह फूटती हैं,
बीज की गोद से दो कोमल कोंपलें।
मानो चादर की ओट से झाँकती बेटी की आँखें,
भीतर छिपाए मुस्कान चंचल।"
हारना या जीतना नहीं बस लड़ते रहना,
इतना सरल ही तो जीवन यह।
बस चलते जाऐं कहीं पहुंचने तक और उसके आगे भी,
बिना विश्राम में संकोच किये, कभी थकने पर।
हज़ारों वर्षों से इस देश को बचाए रखा, संस्कृति ने।
और हम हारते जा रहे संस्कार दर संस्कार
हर बरस, संस्कृति को।"
ऐसी असंख्य, अपूर्ण, अव्यक्त रचनाएँ
तैरती रहतीं हैं मस्तिष्क पटल पर निरंतर,
जैसे तैरते हैं अनगिनत, अविदित पिंड ब्रम्हाण्ड के कपाल पर।
या कमरे के किसी कोने में रखी कोई किताब, थामे हुए शब्दों का बवंडर।।
