STORYMIRROR

Neetu Lahoty

Abstract

3  

Neetu Lahoty

Abstract

उधार की ज़िंदगी

उधार की ज़िंदगी

1 min
249

तमाम बेबसी से बसर

हो रही है ज़िंदगी

बेतहाशा दर्द हैं 

जिसे सीने में

जब्त किये बैठे हैं।


हर पल अपने अश्कों को

पलकों में छिपाये बैठे हैं

कहना बहुत कुछ है

पर चुप्पी साधे बैठे हैं।


मुस्कुराना भी दुष्वार  है

पर होठों पर खिलखिलाहट 

लिये बैठे हैं

जीने की भी कोई

ख्वाहिश नहीं।


पर उधार की ज़िंदगी से तेरे 

आने की आस लिये बैठे हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract