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Neetu Lahoty

Abstract


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Neetu Lahoty

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जीना दुश्वार है

जीना दुश्वार है

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सिर्फ किताबों में बराबरी की हिस्सेदार है 

वरना तो आज भी जीना दुश्वार है 

कहने को देवी कहते हो 


वरना तो आज भी अपने कदमों के नीचे रखते हो 

झूठ कहते हो दी आज़ादी तुमको 

हर बात पर तो वज़ह पूछते हो 


अपनी संगिनी सती -सावित्री चाहिये 

परायी औरत पर नज़र गड़ाये फिरते हो 

गर सच कहने पर आ जाये औरत 


तुम उसका गला घोंट देते हो 

गर अपने जज्बातों को बयां कर दे 

तो तुम उसको कठघरे में खड़ा कर देते हो 


सिर्फ अल्फ़ाज़ों में बराबरी की हिस्सेदार है 

वरना तो आज भी जीना दुश्वार है।


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