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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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तुम्हारी कल्पना

तुम्हारी कल्पना

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कमाल है इसका डूबना भी न ,

जो एक रंग खूबसूरती का दे जाता है

ठीक तुम्हारी मुस्कान की तरह न,

और फिर भी कहती हो कि मैं(स्त्री) कुछ भी नहीं।


कमाल है इसके आस पास भी खूबसूरती दे जाती हो,

लालिमा, सुंदर दृश्य और मनमोहक छटा

और फिर भी कहती हो कि मैं(स्त्री) कुछ भी नहीं।


कमाल है इतराना तेरा बादलों के बीच में,

बारिशों के साथ मिलकर इंद्रधनुष का निर्माण तेरा,

और फिर भी कहती हो कि मैं (स्त्री) कुछ भी नहीं।


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