तुम सा कोई और नहीं
तुम सा कोई और नहीं
हे नारी तुम हो शक्ति स्वरूपा,
सकल सृष्टि आधार हो।
तुम ही हो हे! विष्णुप्रिया,
तुम ही उमा अवतार हो।।
तुम में है वह शक्ति अलौकिक,
तुमसे नहीं कोई जीत सका।
तभी तो तुम कहलाती हो,
इस जग में हे! अपराजिता।।
प्रतिमूर्ति हो सहनशील की,
सभी कष्ट सह लेती हो।
घर की खुशियों के खातिर
वक्त पर चुप रह लेती हो।।
प्रेम समर्पण भाव में डूबी,
करुणामय बन जाती हो।
जब भी आए कठिन वक्त तो,
धैर्यवान बन जाती हो।।
अपने बच्चों की खातिर तुम,
शिक्षक बन ज्ञान सिखाती हो।
हाथ पकड़ कर तुम उनका,
सदा सही मार्ग दिखती हो।।
कभी तो बनती धरणी जैसी,
क्षमाशील बन जाती हो।
अपने मन से बैर मिटा कर,
सबकी प्रिय बन जाती हो।।
तुम जैसा दूजा नहीं कोई,
नश्वर इस संसार में।
ईश्वर की अद्भुत रचना हो,
सृजन जगत के सार में।।
