तुम - मेरे अपने
तुम - मेरे अपने
दूर बैठे क्षितिज की ओर मुँह किये
वृक्षों की ठंडी छाँव तले
प्रकृति का लुत्फ़ उठाते हुए
छल-छल करता पानी पाँव तले
एक दूसरे को निहारते हुए
हम कहीं खो गए थे
कि अचानक वह पूछ बैठा
मुझसे
कौन हूँ मैं तेरा
क्या रिश्ता है तेरा मेरा
मेरे शब्द ग़ायब,
उथल पुथल भावनाओं में
क्या बता पाती
वह भी शब्दों में ,
विचार कब के पंख लगा कर
फुदक कर उड़ गए थे
भावनाएं भी अनायास
कहीं और जुड़ गई थी
प्रकृति न जाने
क्या इशारा कर रही थी
जब आभास हुआ
मन तड़पता हुआ मिला
क्षण क्षण भारी
वातावरण मौन हो चला
शब्दों का शब्दकोष
कहीं विलीन हो गया
बस मुँह से
इतना ही निकल पाया
" तुम- मेरे अपने "

