तुम कभी रुकती नहीं
तुम कभी रुकती नहीं
जब से हमने है अपना होश संभाला।
हमने देखा है, तुम कभी रुकती नहीं।
तुमने मशीन की तरह खुद को ढाला।
बरसों बीत गए, तुम न थकती कहीं।
तुम अल सवेरे ही जाग जाती हो।
गृहस्थी के कामों में हो जाती गुम।
बिन रुके बिन थके कोई काम हो।
लगातार करती ही रहती हो तुम।
असहनीय दर्द से देह रहे तड़पती।
अपनी पीड़ा किसी से नहीं कहती।
कोई पूछे भी तो इंकार ही करती।
चुप रहकर सब अपने अंदर सहती।
त्योहार या हमारे जन्मदिन आते।
अच्छे अच्छे पकवान भी हैं पकते।
हम सब तो स्वाद लेकर हैं खाते।
आँच में तुम्हारे दो नयन हैं जलते।
हमें भरपेट खाना तुम खिलवातीं।
खुद बचा हुआ थोड़ा सा खा लेती।
हम को तृप्त और संतुष्ट करवातीं।
उसमें ही अपनी खुशी हो पा लेती।
हमें पूरे नौ माह अपने गर्भ में पाला।
हमें तुमने इतना दिया लाड़ दुलार।
कष्ट सहकर भी हमें शरीर में ढाला।
कोई रिश्ता नहीं दे सके इतना प्यार।
हमें तुम स्वादिष्ट पकवान खिलातीं।
मक्खन मलाई खिलातीं हम बनें बड़े।
खुद भूखी रहकर हमारा पेट भरवातीं।
जिस से अपने पैरों पर हो जाएं खड़े।
