STORYMIRROR

ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

Abstract

टूटी स्त्री

टूटी स्त्री

1 min
398

पति से 

उपेक्षित स्त्रियां,

तिरस्कृत स्त्रियां,

विधवा स्त्रियां,

एकाकी स्त्रियां


या प्रेम में धोखा खायी स्त्रियां

धीरे-धीरे ओढ़ने लगती हैं

ढ़ेर-सारी जिम्मेदारियां

व्यस्त रखने लगती हैं स्वयं को

ढ़ेर सारे काम-काज, पूजा-पाठ 

या परिवार-समाज के दायित्वों में

ताकि वे सहला सकें

आहत विश्वास को,

अपने टूटे आत्मसम्मान को।


नितांत अकेले में

जी भरकर रो लेने के बाद,

अपनी अवस्था को

हृदयसात करने के साथ,

निराशा और टुटन के

अंधेरों से निकलने के लिए

ढूंढती हैं एक अपनेपन का स्वर,

एक रोशनी की लकीर

और जुड़ने लगती हैं

अपने आस-पास से,

सभी रस्मों- रिवाज़ से

टूटी हुई स्त्रियां...। 


ताकी वे बच सकें 

किसी गलत रास्ते पर जाने से,

एक घातक निर्णय लेने से,

बहलाना चाहती हैं अपने मन को

ताकी अर्थ दे सकें 

अपने अस्तित्व को,

उसके जिंदा रहने के बहाने को,

टूटी हुई स्त्रियां ...।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract