टूट चुका हूं
टूट चुका हूं
टूट चुका हूं बिखर चुका हूं,
अंदर ही अंदर से टूटा हूं।
चंद साँसों से साँसों में,
अपनी मैं ख़ुद से ख़ुद गिनने लगा हूँ।
वक़्त भी रेत कि तरह हाथों से,
फिसलने लगा हैं, प्यार के
अहसासों में अहसास अब
मेरे पिरोने लगा है।
मौत भी सिरहाने खड़ी हो के
पूछ रही मुझसे, क्यूँ
ख़ामोशी में मैं अपनी ज़िंदगी
को ख़ुद से ख़ुद अब जीने लगा हूँ।
