STORYMIRROR

Geeta Upadhyay

Abstract

2  

Geeta Upadhyay

Abstract

ठोकरें खाता है

ठोकरें खाता है

1 min
233


क्यों आंखों में समुंदर लिए फिर रहा है

छलक ना जाए ये कहीं पलके बंद करने से भी डर रहा है

इतनी मोहब्बत भी अच्छी 

नहीं है अश्कों से

बहा के कुछ आराम मिलता है सीने में

चाहकर भी नहीं मिलता कभी

मिलकर भी खो जाता है

इस मायाजाल में फंसकर

इंसा क्या से क्या हो जाता है

मंजिल की तलाश में 

दर-दर की 

ठोकरें खाता है




Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract