STORYMIRROR

Khushboo A.

Abstract

4  

Khushboo A.

Abstract

तोता

तोता

3 mins
22

शाम का पहर है और ठंडी बयार चल रही है

ये वही वक़्त हुआ करता था जब मेरे पापा

के स्कूटर की आवाज़ आती थी

और हार्न की पीप पीप सुनकर मेरे घर

के छोटे आंगन के दरवाजे की

तरफ मैं दौड़ लगया करती थी

मैं भागती थी इसीलिये

सबसे पहले जाकर पापा के लिए 

दरवाजा खोलना चाहती थी

ताकी वो स्कूटर किनारे लगाकर

उसकी डिकी खोलें

और मुझसे कहें चलो अपनी फ्रॉक की झोली बनाओ

क्योंकि मैं ढेर साड़ी जंगल जलेबी लाया

या ले आएं इमली या मीठे बेर

मैं भर लेती उनको झोली में और

धम्म से गिरती बिस्तर पर लगा करके उसका ढेर

कभी वो रंग बिरंगी कॉमिक्स लाते थे

जिन्हे में दिन रात पढ़ती थी,

छुपा के स्कूल बस्ते में डालकर

अपनी सहेलियों के साथ लंच ब्रेक में पढ़ती थी

तो कभी मैं पापा से ज़िद किया करती थी 

कि आप मुझे स्कूटर के हैंडल के पीछे खड़ा करके 

कॉलोनी का चक्कर कटवाओ

वो कहने लगे थे कि बड़ी हो गई हो तुम

अब तुम्हारा कद मेरे सर से ऊपर जाता है

मेरे आगे अगर खड़ा कर दूं तुम्हें

तो मुझे आगे कुछ भी नजर नहीं आता है 

हां मैं उन्हें अक्सर लाने को कहती थी

एक बड़ा सा सुंदर पिंजरा

मुझे पालना था क्योंकि एक छोटा प्यारा तोता

पापा समझाते हैं कि कैद में रखे कोई तुम्हें 

और खिलाए तुम्हें रोज अपने पसंद का खाना

प्यार करें तुमसे बेहद भरपूर,

और पुकारे तुमको दिन रात

पर सिर्फ उनकी यही हो एक शर्त 

कि रहना होगा इसी घर में चाहे कोई भी हो जाए बात

अब बताओ क्या रह पाओगी ऐसी जगह पर?

मैं सोच में पड़ जाती थी

कभी ज़िद करती थी तो

कभी आगे बढ़ जाती थी

फिर वक्त गुजरा ऐसे कि

स्कूटर के आगे खड़े होने के रोमांच से

पीछे की सीट पर जाने कब सिमट गई

अब पैदल चलने लगी थी मैं मीलों तक,

स्कूटर की सवारी कहीं लुप्त हो गई

मन की इच्छाएँ जाने कब समझौता हो गई

और एक दिन पापा की चिड़िया भी एक तोता हो गयी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract