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ANIRUDH PRAKASH

Abstract

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ANIRUDH PRAKASH

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थक के बैठना तो है यहाँ गुनाह-ए-अज़ीम है

थक के बैठना तो है यहाँ गुनाह-ए-अज़ीम है

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मह-ओ-मेहर क्या सितारों ने भी लिया मुँह मोड़ है 

अब तो घर के चराग़ों ने भी जलना दिया छोड़ है 


भटके कोई ना कैसे ज़िंदगी की रहगुज़र में 

कदम कदम पर यहाँ फैसले का मोड़ है 


थक के बैठना तो है यहाँ गुनाह-ए-अज़ीम 

है जब तक ज़िंदगी लाज़िम दौड़ है 


बेसबब नही है मेरी ग़मों से दोस्ती 

मेरी खुशियों के दरमियाँ मुझसे दुश्मनी की होड़ है


चंद तल्ख़ लफ़्ज़ों से ही टूट जाता है 

ऐसा कमज़ोर यहाँ रिश्तों का जोड़ है


किताब-ए-हयात के जिस सफ़्हे पे था ज़िक्र मसर्रतों का 

पढ़ने के लिए उसे एक मुद्दत से रखा मोड़ है


जो भी आया तेरे जहाँ में उलझ के रह गया 

तेरे तिलिस्म का मौत के सिवा कहाँ कोई तोड़ है


दिल-ओ-दिमाग से तो कब का निकाल दिया उसे 

मगर ख़्वाबों पर कब चलता किसी का ज़ोर है


चल रहा है ज़माना जिसकी दिखाई राह पर 

उस शख़्स की खुद की शख़्सियत कश-कोर है


उड़ाई थी कभी अपनी वफ़ा-ए-सबा से पतंग इश्क़ की

अब अपने हाथों में बस तेरे ला-हासिल वादों की डोर है


मंज़िल तो ना जाने कब की पीछे छूट गयी 

मुसाफ़िर-ए-दिल अपनी धुन में चला जा रहा ना जाने किस ओर है


खबर ना हुई किसी को जब सर कटा महकूम का और  

एक आह ली साहिब-ए-वक़्त ने तो जमाने में बरपा शोर है।


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