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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

तारों की छांव में

तारों की छांव में

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वो भी क्या दिन थे जब हम और तुम 

मिलते थे रात के अंधियारे में 

महकते उपवन में 

शीतल पवन के झोंको के बीच 

तारों की छांव में । 

मिलने की उमंग से 

दमकता था चेहरा तुम्हारा 

पूनम के चांद की तरह 

जिस पर एक नटखट सी लट 

आवारा बादल की तरह 

आकर रुक जाती थी 

चांद को अपने आगोश में 

समेटने का प्रयास करती थी 

मैं उस बदमाश लट को 

फूंक से हटाने की चेष्टा करता था

तुम आंखें बंद कर लेती थी 

और मैं चुपके से तुम्हारे अधरों पर 

प्रेम निशानी अंकित कर देता था 

हमारी सांसें एकाकार हो जाती थीं 

दिल एक साथ धड़कते थे 

हमारे मिलन के साक्षी 

ये "तारे" हुआ करते थे । 

अब "एयर कंडीशन" की लत ने 

प्रकृति का वह आनंद छीन लिया है 

"तारों की छांव" में "अभिसार" का 

अब वो आनंद कहां रहा है । 

गुलशन ना सही , छत पर ही सही 

एक बार फिर से जी लें वो पल 

एक बार फिर से बैठें तारों की छांव में 

और मैं तुम्हारी गोदी में सिर रखकर 

भुला दूं खुद को और देखता रहूं तुम्हें 

एकटक , निर्मल, निश्चल ।। 



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