स्वतंत्रता-मेरी नज़रों से
स्वतंत्रता-मेरी नज़रों से
जीने का , जीवन निर्वाह करने का स्वयं का तंत्र है मेरे पास इसलिए स्वतंत्र हूँ मैं ,
पर अगर स्वतंत्र सोच मैं रखूँ, तो घमंडी, निर्लज और ना जाने किन-किन नामों से पुकारने लगता है ज़माना मुझे , क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?
आज़ाद हिन्द की मिट्टी पर जन्मी भारत माँ की पुत्री हूँ इसलिए स्वतंत्र हूँ मैं ,
पर अगर अपनी इच्छा से स्वतंत्र जीवन जीना चाहूँ तो बहुतों के दिलों में टीस जगा जाती हूँ ,क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?
मंदिर-मस्जिद में कभी फर्क ना किया मैंने , आखिर भगवान तो सबका एक है और स्वेच्छा से इबादत करने को स्वतंत्र हूँ मैं ,
पर समाज ने मुझे बेड़ियाँ पहना दीं ,अल्लाह के दरबार में जाने से भी रोक लगा दी,क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?
स्वावलम्बी हूँ , पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलती हूँ तो क्यों कष्टों और त्यागों की मिसाल बनूँ मैं क्योंकि स्वतंत्र हूँ मैं,
पर खटकती हूँ लाखों की नज़रों में जो हिदायत देते मुझे अपनी हद में रहने की , क्या सच में स्वतंत्र हूँ मैं ?
अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्वदा बेबाकी से आवाज़ उठाई मैंने क्योंकि आखिर स्वतंत्र हूँ मैं,
पर जब-जब ऐसा किया मैंने,किसी ने उद्दंडी किसी ने उग्रवादी की उपाधि दे दी, क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं?
खुले विचारों और सोच के संग जीवन निर्वाह किया मैंने क्योंकि आखिर स्वतंत्र हूँ मैं,
पर ज़माने ने हाथों में चूड़ियाँ और पैरों में पायल पहना के, गृहलक्ष्मी बना के,कैद चारदीवारी में कर दिया मुझे ,क्या सच में स्वतंत्र हूँ मैं?
लेकिन अब समय आ गया है आवाज़ अपनी बुलंद करने का , इस सभ्य समाज को समझाने का , कंठस्थ एक - एक को करवाने का,
कि स्वतंत्रता के मायने और कायदे किसी जाति,लिंग या धर्म के मोहताज नहीं,
स्वतंत्र हर नर है तो स्वतंत्रता के रसपान का नारी को भी बराबर अधिकार है , वह इस परिपेक्ष से बाहर नहीं.
पशु-पक्षियों ,पेड़-पौधों की सुरक्षा के लिए सबने आवाज़ उठाई है ,
अब नारी की सुरक्षा के लिए भी आवाज़ उठानी है,
स्वतंत्र जीवन स्वयं जीयो ,नारी को भी स्वतंत्र जीवन जीने दो,
वास्तव में स्वतंत्र कहलाएंगे हम तभी, यह बात अब एक- एक को समझानी है.
