सवाल बादलों से....
सवाल बादलों से....
बादलों,
माना तुम हो मुसाफ़िर,
ठहरते नहीं किसी जगह,
ख़्वाबों का हाथ , थाम कर ,
उड़ते हो, एक देश से दूसरे देश,
बनकर मेघदूत, प्रेमियों के संदेश,
लाते और ले जाते हो...
पर इतना तो, बतला दो,
कि, क्यूँ, धरती को कहीं तरसाते हो,
और कहीं कहर बरसाते हो.....?
एक सवाल ये भी है तुमसे,
कि, आता कहाँ से है इतना जल तुम में,
क्या धरती के आँसुओं को समेट कर बनाई है घटा तुमने.....?
या, नदियों का जल चुरा कर, बूँदों की लड़ियाँ, सजाई हैं तुमने....?
जो भी हो,
बस एक विनती है तुमसे,
बरसना ऐसे कि, रहे ना कोई प्यासा,
आये हो तो लौट मत जाना, यूँ ही, दे कर दिलासा....
