STORYMIRROR

शालिनी मोहन

Abstract

2  

शालिनी मोहन

Abstract

सुनो वक़्त

सुनो वक़्त

1 min
147


सुनो वक़्त

एक दिन तुम्हारे

जवान दिल को

निकाल कर 

फेंक दूँगी समन्दर में 


फिर क़ैद कर के तुम्हें 

एक शीशी में, गिनूँगी

तुम्हारी छोटी छोटी

साँसें और

बड़े बड़े अहसास

बोलो, मंज़ूर है



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract