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शालिनी मोहन

Abstract

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शालिनी मोहन

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सुनो वक़्त

सुनो वक़्त

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सुनो वक़्त

एक दिन तुम्हारे

जवान दिल को

निकाल कर 

फेंक दूँगी समन्दर में 


फिर क़ैद कर के तुम्हें 

एक शीशी में, गिनूँगी

तुम्हारी छोटी छोटी

साँसें और

बड़े बड़े अहसास

बोलो, मंज़ूर है



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