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Anita Sharma

Fantasy Others


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Anita Sharma

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सुन सखी

सुन सखी

1 min 170 1 min 170

सुन सखी

तुम क्या क्या

कर जाती हो प्रकृति की हर कृति में

तुम किस तरह घुल जाती हो

बातों बातों में ही कैसे

सुख दुःख सारे कह जाती हो


सुन सखी

घास के मैदान में

बीनते हैं जंगली फूल

चल हरे कालीन वाले

पहाड़ों पर 

सरपट फिसलते हैं

बर्फ के पिघले झरने में

अंजुली से फुहार उड़ाते हैं


सुन सखी

चल ज़रा कुछ दूर और

क्षितिज के उस छोर तक

स्वर्ण सा आवरण

इन बादलों से लेकर

सतरंगी शाम को जी लें

चल ओट में जाते

सूरज से चलते चलते

थोड़े सुख दुःख के

किस्से बांटकर

अपने घर को हम भी

विदा हो लें


सुन सखी

सूरज भी डूबने लगा

पीड़ा भी छटने लगी

चल घर लौट चले कि

प्रकृति भी अब सोने लगी

चल कि फिर आएंगे कल

फिर से नए सवेरे के साथ

चलेंगे एक नए उल्लास

या किसी द्वन्द की ओर।


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