सुन बेटी तू बड़ी हो रही
सुन बेटी तू बड़ी हो रही
सुन बेटी तू बड़ी हो रही
गांठ बांध ले तू कुछ आज
जीवन की कुछ सीख ले मुझसे
कुछ मामूली और कुछ ख़ास
नहीं रोकती मैं उड़ने को
खुले गगन में तुझे कभी
आस अगर निज पंखों से है
खुद पर भी रखना विश्वास
ताक लगाए बैठे अक्सर
कई शिकारी राह-डगर
फंसना न उनके जालों में
तनिक जो हो अन्तःआभास
मैं न रहूँगी संग हमेशा
सफर में तेरे हर एक पल
पड़े अगर तूफान से लड़ना
अन्तर की सुनना आवाज़
सुनकर सारी बातें माँ की
बिटिया ने भी प्रश्न किया
कौन है अच्छा,कौन बुरा है?
हो कैसे इसका प्रतिभास
किस पर करूँ भरोसा बोलो
डर लगता है दुनिया से
अंधकार में गुम होने का
हरदम होता है एहसास
खाल में बैठे दुनिया के
जाने कितने हैवान यहाँ
गैरो से डर अक्सर लगता
घुटता दम और घुटती साँस
लड़की होना सहज नहीं है
लड़ूँ मैं दुनिया से कैसे?
गिद्ध भरी नज़रों से बचकर
कैसे मिले खुशी उल्लास
बेटी की चिंता है वाजिब
माँ भी तो एक लड़की थी
उसने भी वो दंश थे झेले
माँ थी कल, बेटी है आज
पर माँ कैसे कहेगी बेटी,
पिंजरे में तू कैद रहे?
नहीं कुरूप ये दुनिया इतनी
कर न निज मन को हताश
सीख तू रक्षा खुद की करना
हर जंग को तू तैयार रहे
कर खुद में समाहित आत्मबल
खुद में ही शक्ति कर तलाश।
