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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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सुख और बड़े आदमी

सुख और बड़े आदमी

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सुख ढूँढने में और बढ़े आदमी के दुःख

होते नहीं हैं ख़त्म कभी ज़िन्दगी के दुःख 


हर एक आदमी को चकाचौंध चाहिए

लेकिन कोई समझता नहीं रौशनी के दुःख 


यूँ ही नहीं मैं अर्श से दरिया में गिर पड़ा

देखे गए न मुझसे किसी जलपरी के दुःख 


बेइल्म ज़हनियत के भी होते हैं ग़म हज़ार

इन सबसे मुख़्तलिफ़ हैं मगर आगही के दुःख 


खुशियाँ नई सदी की बरतने के बावजूद

आँखों में मेरी क़ैद हैं गुज़री सदी के दुःख

आँखों का क्या है उनको तो मंज़र नए मिले

पैरों से मेरे पूछिये आवारगी के दुःख


बैठे हैं सर झुकाये हुए जिनके नाख़ुदा

उन कश्तियों से पूछिये सूखी नदी के दुःख


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