सशपथ रक्षक ही भक्षक बन जाते
सशपथ रक्षक ही भक्षक बन जाते
भ्रष्ट बेईमानों से सजी संसद,
क्या लोकतंत्र भ्रष्टाचार का स्थल।
आम आदमी करता प्रतिपल,
भ्रष्टाचारियों की जयजयकार रचकर।
कहां अब कर्मठ ईमानदार आते,
जनसमस्या का निराकरण कराते।
भ्रष्टाचारी हितैषी दलालों के योगेश्वर,
रिश्वतखोरी सिफारिशें कराते भूपेश्वर।
शत्रु अपराधी यहां खूब जमकर आते,
अपने मंसूबों पर काम तमाम कर जाते।
जाति धर्म पिरोये हुये प्रशासन आते,
सशपथ रक्षक ही भक्षक बन जाते।
