स्पर्श
स्पर्श
सर्द मौसम, गर्म सांसें
और उफ्फ ! तुम्हारा स्पर्श
महसूस होते ही
धड़कनों की वीणा के तारों से
मधुर धुन निकली
गुनगुनाने लगी चारों दिशायें
संगीत के सातों स्वर जैसे
हवाओं में घुलकर सुनाने लगे
मुहब्बत की दास्तानें
लाज से मेरा तुम्हारी आगोश में सिमट जाना
जरा और सिमट जाना
लगा कि जमाने के सारे सुख
बस इसी पल में समाये हैं
ऐ वक्त! बस ठहर जा, यहीं पर ठहर जा
इसी लम्हे में मुझे ताउम्र गुजारने दे
छूकर उनके लबों को अमृतपान करना है
उसके बाद गम नहीं भले ही मर जाऊं
सनम की शैतान उंगलियां
जब बदन पर डगमगाती है
तू क्या जाने मेरी जान लिये जाती है
ऐ सुबह! तू आना ही मत
आज की रात को लम्बा कर दे
खो जाने दे मुझे महबूब की मदहोश निगाहों में
मेरी तनहाइयों ने जख्म जो लगाये थे
आज उन पर जरा सा मलहम मल दे
होने दे पनाह मुझको उनकी गर्म सांसों में
हंसने दे खुलकर आज उनकी बातों में
मेरी हुस्न की बारिश में भीग जायें जब वो
घूंट घूंट भरकर मुझको पी जायें जब वो
तब तू चली आना, गुनगुनाना, मुस्कराना
अभी सो जाने दे ,एक जान हमें हो जाने दे।

