STORYMIRROR

dr vandna Sharma

Drama

5.0  

dr vandna Sharma

Drama

सपनो को सजाया जाये

सपनो को सजाया जाये

1 min
14K


कभी रहता था दिवाली का इंतज़ार

गिनते रहते थे दिन बार बार

सबसे छुपकर करते थे तैयारी

घर को सजाते थे बारी बारी


कहा गए वो बचपन के दिन

ना वो इंतज़ार रहा

ना वो पागलपन

सबकी ज़िंदगी में है बड़ी उलझन

कैसे करें स्वागत इन खुशियों का


वक़्त कहाँ है अपने लिए सोचने का

कब दिन ढला कब रात आयी

कब नींद से जागी

कब नींद आयी


सोचती हूँ कर दू बगावत खुद से

छोड़ सारी दुनिया जुड़ जाऊं खुद से

कुछ पल चुरा लू अपने लिए

कुछ पल जी लू अपने लिए


बड़ी कमजोर है ज़िंदगी की डोर

क्यों न इसके टूटने से पहले

सपनो को सजाया जाये

रुख खुशियों का मोड़ दे अपनी ओर !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama