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Shakuntla Agarwal

Abstract

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Shakuntla Agarwal

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सपने

सपने

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आसमाँ से ऊँचे सपने अगर पाले हैं,

उड़ान लम्बी भरनी होगी !

गिर जाओ अगर ठोकर खाकर,

बिन बैसाखियों के उठ,

जंग लड़नी होगी !


सपने ही तो पँख लगा, पखेरू बना,

उड़ना सिखाते हैं !

दूर आसमानों में उड़ान भरवाते हैं !

सपने जो न सँजोये होते,

हम निढ़ाल, असहाय, सुस्त पड़े होते !


सपनों की इंद्रधनुषी दुनिया है,

बंद आँखों में भी रंगीनियाँ घुलवाती हैं !

सातों रँग उम्मीद जगाते हैं,

सात - समुन्द्र की सैर करवाते हैं,

अमरता के सपने जिन्होंहने पाले हैं !


वह देश की आन - बान - शान पर,

मर मिटने वाले हैं !

जीते हैं तो शेर की तरह,

मरते हैं तब भी शहीद का तगमा पाते हैं,

सपने हैं तो सपने हैं, आज टूटे, कल अपने हैं !


सपने रह जाए अधूरे, ठेस दिल को लगती है !

सपने जो हों पूरे, दिल की बाँछे खिलती हैं !

सपनों की भी अजीब दास्ताँ है,

कहीं राजगद्दी पर बिठाते हैं,

कहीं सूली पर चढ़वाते हैं !


भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव ने,

आज़ाद भारत का सपना पाला,

सपनों के तन - मन होम कर डाला !

महात्मा बुद्ध ने निर्वाहण का सपना पाला,

बौद्ध धर्म का स्थापत्य कर डाला !


मन में हो दृढ़ निश्चय,

सपने हकीकत बन जाते हैं !

वर्ना हक़ीक़त की चट्टानोँ से टकरा,

लहरों की तरह लौट आते हैं !


सपनों की भी अज़ीब दास्ताँ हैं,

कभी ख़ुशी, कभी गम अपना हैं !

सपनों को सपना समझ जियो,

कभी अमृत, कभी विष का घूँट,

आँख मूँद पियो !


छोटे सपनों में क्या जीना "शकुन",

पीना है तो निर्वाहण,

या शहादत का अमृत पीना !


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