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JAYANTA TOPADAR

Abstract Romance Fantasy

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JAYANTA TOPADAR

Abstract Romance Fantasy

सफर

सफर

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निकल चला

 मैं सफर पे...

कोई ठिकाना

नहीं मेरा...

दर-ब-दर

भटकता फिरता हूँ

मैं यूँ बेइंतहा...!


कुछ वक्त तो

लगेगा ही

मेरे लौट आने को...

अगर इंतज़ार की

कौई इंतहा नहीं,

तो मेरे आने तक

अपने ख्वाबगाह का

पूरा ख्याल रखना...।


मेरे हमसफ़र हैं

मेरी वफा-ए-तन्हाई...

और हैं बंद लिफाफों में

मेरी दर्द की अनसुनी दास्ताँ...

किसी रोज़ मुलाक़ात हुई, तो

मेरे दिल की गहराइयों में

उतरके देखना...

तुम्हें डूबने नहीं देंगी

मेरी ये दीवानगी...


मेरा आवारापन मुझे

बहुत भाता है,

क्योंकि मैं

किसी भी हद तक 

जाने की

औकात रखता हूँ...।


हाँ, बेशक़ मैं अपने

बेशक़ीमती पलों को

इस जहां की

हसीन वादियों में

बिताने की

ख्वाहिश रखता हूँ...!

इसलिए में सफर पे

निकल चला हूँ...!


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