दास्तां-ए-हक़ीक़त
दास्तां-ए-हक़ीक़त
पाई-पाई जोड़कर
सपने बुनता हूँ मैं
शाम-ओ-सहर...
फिर भी न जाने क्यों
ज़िन्दगी की जद्दोजहद
किश्तों में मुझसे
मेरी नाखुशी का
हिसाब मांगती है
और मैं कहता हूँ-
"बेइंतहा मजबूरियों के दलदल में
मेरे सपने धंसते जा रहे हैं...
और मैं तिनका-तिनका
नाकामियों के चलते
बस सांसों का सिलसिला
चलाए जा रहा हूँ...!"
