सोचता हूं, कुछ लिखूं
सोचता हूं, कुछ लिखूं
सोचता हूं, कुछ लिखूं,
पर ना जाने क्या हो गया है सोच को मेरे,
जैसे ताले पड़ गए हों इसमें,
कुछ लिखने को सोचता हूं,
पर मेरी सोच में एक खालीपन सा है
जो मेरे आंखों के सामने मुझे अचरज भरी नज़रों से देखता है और चुप हो जाता है।
मन मेरा स्थिर सा तो लगता है,
पर एक अजीब कश्मकश में फंसा फंसा सा रहता है,
खुद में ही उलझता जाता है,
जाने क्यों अंदर ही अंदर
सूखता जाता है।
कल्पनाओं के घोड़े जब दौड़ता हूं मैं भाव खोजने,
तो टूटे फूटे शब्द,पुरानी यादें और कुछ धुंधला धुंधला सा,
मेरी सोच में लहरों की तरह पास तो आती है, उम्मीदों के साथ,
पर पल भर में ठहर कर,
मन के रेत में लिखें शब्दों को बहाकर ले जाती है अपने साथ,
मेरी दौड़ फिर निरर्थक सी जान पड़ती है,
और सोच कहीं कोने में दुबकी पड़ी ख़ामोश हो जाती है,
विचार शून्य और शब्द रहित हो के।
जितना सोचता हूं,उतना ही खुद से दूर होता जाता हूं,
मन की उलझनों में उलझता चला जाता हूं,
अभिव्यक्ति अब भी मुखर है मुझमें,
कुछ व्यक्त करने को,एक जमीनोदस्त नदी सामान,
जो बह तो रही है मेरे मन में अंदर ही अंदर खुद में,
पर शब्दों की शून्यता लिए,और
ये जो चेहरे पे मुस्कान है मेरे,
ये बोझ तले दबी है,
उम्मीदों की गठरी खुद सर पर लिए।
