संवेदना
संवेदना
एहसास की सतह पर
कोहरे की चद्दर बिछी हो जैसै
ज़ख्म कोई सिमटा है दिल के कोने में
बन के दर्द बैठा है.!
हिमगिरी सी संवेदना ज़िंदगी की
आरि चलाते अथाह मन को
कतरा कतरा बांट रही है
आशाओं के मौसम क्यूँ होते नहीं.!
हादसो का सफ़र चलता रहता है
अब तो पीर चहरे पर फबने लगी है
दर्जी बन हौसलों की तुरपाई बुन लूँ
उस पर उम्मीद की कढ़ाई कर लूँ.!
या लाँघ जाऊँ हर सीमा
किसी एसे जहाँ कि तलाश में
निकल पडूँ पैदल चलती ही जाऊँ
वहाँ तक जहाँ सुकून का
फैला हुआ शामियाना हो.!
सुख का सागर लहराता हो
बगियन सा आँगन हो
हर तमन्नाएँ पूरी होती हो
जहाँ हाथ उठाएँ क्या ऐसी कोई
अर्श की चौखट है कहीं।
