STORYMIRROR

Archana Singh

Classics

4  

Archana Singh

Classics

समय ही नहीं है

समय ही नहीं है

1 min
321

मानव विकास क्या हुआ 

आज फुर्सत नहीं है

 किसी के पास

 कि पोंछ दें

झुर्रियों में लिपटे 

चेहरों पर लुढ़के


आंसुओं के कतरों को 

आज वक्त नहीं है

 किसी के पास

 कि खोल सके अपने सुख-दुख की गठरी

 किसी के पास बिताकर दो घड़ी 

आज अवकाश नहीं है 


किसी के पास कि

 सुन सके आवाज 

भावनाओं में लिपटी हुई

संवेदनाओं से भीगी हुई 

आज वो बेला ही नहीं है

 किसी के पास कि

दे दे थोड़ा सा प्रेम- रस

 रिश्तों के मुरझाए से उपवन को

 आज अवधि ही नहीं है


 किसी के पास कि 

वक्त हुआ इतना महंगा 

छुड़ा रहे हर रिश्ते हाथ 

यह कह कर कि देर हो रही है 

आज समय ही नहीं है 

किसी के पास 

विकास क्या हुआ कि

आज समय ही 

नहीं है किसी के पास ll


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics