समर्थ
समर्थ
ये दकियानूसी मानसिकताएं , ये अदृश्य-से पिंजरे ,
ये मुरझाये गुलशन में कांटों भरे रास्ते
अगर इतनी ही कठिन है डगर जीवन की , तो
क्या ये तंग ज़िन्दगी जीना ज़रूरी है?
यह बिच्छू सा सवाल उसके लबों पर जब आया
उसकी आवाज़ को डांक मार , काट गया उसकी जबान
आज एक और नदी का खिलखिलाता कलरव ,
अहंकारी समुन्दर के तूफ़ान में कहीं खो गया
आखरी अपने शब्दों को हकलाते बस वो इतना ही कह पायी
टिके रहना , डटे रहना की वक़्त के साथ सब सही हो जाता है
की समय हर मर्ज़ की बस ये एक ही दवा है
जीती खुशियां ,जाते गम ही जीवन की आबो-हवा है।
