STORYMIRROR

अशोक जोशी

Abstract Romance

3  

अशोक जोशी

Abstract Romance

समर्पण

समर्पण

1 min
194

तुम कभी मुझे अपना, 

कहकर तो देखो,

अपना दिल अपनी जां,

निसार करके तो देखो,

मोम की बनी एक गुड़िया हूँ,

पिघल जाऊँगी,

लहराकर तुम्हारी बांहों, 

में समा जाऊँगी...


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract