STORYMIRROR

अशोक जोशी

Abstract Romance

3  

अशोक जोशी

Abstract Romance

समर्पण

समर्पण

1 min
190

तुम कभी मुझे अपना, 

कहकर तो देखो,

अपना दिल अपनी जां,

निसार करके तो देखो,

मोम की बनी एक गुड़िया हूँ,

पिघल जाऊँगी,

लहराकर तुम्हारी बांहों, 

में समा जाऊँगी...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract