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समाधि

समाधि

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तूने रूप छोड़ा,

रंग छोड़ा।

स्वाद छोड़ा ,

गंध छोड़ा।


राग भी ,

विराग भी,

प्यार भी,

और त्याग भी।


मिथ्या,

संसार छोड़ा,

वृथा,

विचार छोड़ा।


अब झूठ से

विरक्त हो,

न सत्य से

आसक्त हो।


ये सत्य है,

अनासक्त हो,

फिर भी आनंद से,

विरक्त हो ?


कि ध्यान भी तो नाव है,

क्यों रत इनमे पाव है ?

कि तप छोड़ो,

त्याग भी,

ये राग भी,

वैराग भी।


आनंद हीं बाधा है,

आनंद की चाह में।

तेरा ईश्वर रोड़ा बना है,

ईश्वर की राह में।


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