सकून
सकून
मुफलिसी में सकून पाया हमने
दर-बदर सर न झुकाया हमने
हैं मुसाफिर कई रास्तों के हम
फिर भी एक दूजे को सताया हमने
बारगाह-ए-खुदा साहिल है सैलाबों में
सौंप दिया उसको सरमाया हमने
जिंदगी दौड़ -धूप से भरी थी मगर
अक्सर हौसलों को आजमाया हमने
बिन चिराग भी सफहे पलटते रहे
अंधेरों में भी बहुत कुछ पाया हमने
पसीने को नसीब मान लिया है जबसे
वक्त को न किया कभी ज़ाया हमने
हर कदम पर हमारे नजर थी उनकी
फिर भी रिश्तों को निभाया हमने
कायम रहना है तिलिस्म-ए-दुनिया में
जीतकर दुनिया को दिखाया हमने।
